Saturday, March 7, 2026
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महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “सशक्त नारी: महिला सशक्तिकरण पर वैदिक विमर्श” विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन

नारी को सम्मान और शिक्षा मिले बिना समाज प्रगति नहीं कर सकता — भदेल

विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका ‘त्रिवेणी’ के द्वितीय अंक का हुआ विमोचन 

 

अजमेर : 7 मार्च 2026

 

भारतीय समाज की जड़ें सनातन संस्कृति में निहित हैं और इस संस्कृति का मूल आधार वेद हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती ने उस समय नारी शिक्षा और अधिकारों की बात की, जब महिलाओं को शिक्षा से वंचित किया जा रहा था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस समाज की आधी आबादी को ज्ञान और शिक्षा से दूर रखा जाएगा, वह समाज कभी भी उन्नति नहीं कर सकता। इसलिए महर्षि दयानंद सरस्वती ने नारी शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करते हुए वेद ज्ञान को महिलाओं तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भारतीय संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार प्रदान किए हैं, किन्तु वास्तविक सशक्तिकरण तभी संभव है जब परिवार और समाज में भी महिलाओं को समान सम्मान प्राप्त हो। आधुनिक समय में सोशल मीडिया और वैश्वीकरण के प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि बदलते समय के साथ बेटियों को सशक्त बनाने के साथ-साथ उन्हें सही दिशा, मूल्य और संस्कार देना भी आवश्यक है। भारतीय महाकाव्यों रामायण और महाभारत में भी स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है और इन ग्रंथों में स्त्री के सम्मान, शक्ति और त्याग के अनेक प्रेरणादायी उदाहरण मिलते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव शक्ति, ज्ञान और सृजन की प्रतीक के रूप में सम्मानित स्थान प्राप्त रहा है। उक्त विचार अजमेर दक्षिण विधायक एवं पूर्व मंत्री अनीता भदेल ने महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी “सशक्त नारी: महिला सशक्तिकरण पर वैदिक विमर्श” के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए । यह संगोष्ठी महर्षि दयानन्द शोधपीठ एवं महर्षि दयानन्द सरस्वती यूजीसी चेयर के संयुक्त तत्वावधन में आयोजित की गई |

 

भदेल ने पारिवारिक संस्कारों के महत्व पर बल देते हुए कहा कि यदि बचपन से ही बेटों को महिलाओं और बहनों के सम्मान का संस्कार दिया जाए, तो समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को काफी हद तक रोका जा सकता है। महिला सशक्तिकरण केवल महिलाओं का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। अक्सर महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है, किन्तु विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी में पुरुषों की सक्रिय उपस्थिति यह दर्शाती है कि समाज अब इस विषय को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार कर रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि भारतीय वैदिक साहित्य में स्त्री को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। वैदिक परंपरा में स्त्री को ‘साम्राज्ञी’ और ‘ब्रह्म वाहिनी’ कहा गया है। उन्होंने कहा कि ‘ब्रह्म’ परम सत्य, ज्ञान और सृष्टि का प्रतीक है और स्त्री उस ज्ञान और सृजन शक्ति को आगे बढ़ाने वाली वाहिनी है। कुलगुरु प्रो. अग्रवाल ने कहा कि भारतीय सनातन साहित्य में स्त्री को सदैव शक्ति, ज्ञान और समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इसी कारण हमारे सांस्कृतिक जीवन में मां दुर्गा शक्ति का, मां लक्ष्मी समृद्धि का और मां सरस्वती ज्ञान का प्रतीक मानी जाती हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ समाज में कुछ विकृतियां अवश्य आईं, जिनके कारण कई ग्रंथों और कथनों की गलत व्याख्या भी प्रचलित हो गई। उन्होंने कहा कि अनेक साहित्यिक पंक्तियों और शास्त्रीय संदर्भों को गलत अर्थों में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनके वास्तविक अर्थ अनुशासन, मार्गदर्शन और जीवन मूल्यों से जुड़े हुए थे। इसलिए आवश्यकता है कि हम अपने प्राचीन ग्रंथों और साहित्य को सही संदर्भ और दृष्टिकोण से समझें। कुलगुरु ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को कभी दुर्बल नहीं माना गया। परिवार और समाज में आज भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है और अनेक निर्णयों में उनका मार्गदर्शन स्वीकार किया जाता है। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण भारतीय संस्कृति का मूल भाव रहा है, किंतु समय के साथ उत्पन्न हुई विकृतियों को दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने शोधार्थियों और शिक्षाविदों से आह्वान किया कि वे भारतीय परंपरा और वैदिक चिंतन पर आधारित शोध के नए आयाम विकसित करें, जिससे समाज में महिला सशक्तिकरण की सही अवधारणा को स्थापित किया जा सके। अंत में कुलगुरु प्रो. अग्रवाल ने आशा व्यक्त की कि इस संगोष्ठी से प्राप्त विचार और सुझाव शोध एवं सामाजिक चिंतन को नई दिशा प्रदान करेंगे तथा समाज में नारी के सम्मान और सशक्तिकरण को और अधिक मजबूती मिलेगी।

 

कार्यक्रम में मुख्य वक्ताओं के रूप में — केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू से प्रोफेसर वंदना शर्मा, सेवानिवृत्त वरिष्ठ आचार्य एवं लोकपाल प्रो. लक्ष्मी ठाकुर , वित्त नियंत्रक नेहा शर्मा तथा राजकीय कन्या महाविद्यालय, अजमेर से डॉ. नीहारिका राठौड़ ने महिला सशक्तिकरण से जुड़े विभिन्न आयामों पर अपने विचार व्यक्त किए। 

कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका ‘त्रिवेणी’ के द्वितीय अंक का लोकार्पण किया। वक्ताओं ने कहा कि यह पत्रिका विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की वैचारिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण मंच है, जो शिक्षा, संस्कृति, समाज एवं समसामयिक विषयों पर सार्थक विमर्श को प्रोत्साहित करती है।

कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन प्रो. ऋतु माथुर द्वारा किया गया, जबकि अतिथियों का परिचय एवं स्वागत कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा द्वारा कराया गया। कार्यक्रम के अंत में प्रो. मोनिका भटनागर ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति रही।

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