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महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्विद्यालय में ‘गोडावण दिवस’ पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्विद्यालय में ‘गोडावण दिवस’ पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

अजमेर : 21 मई 2026

महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्विद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में ‘गोडावण दिवस’ उत्साहपूर्वक मनाया गया।

कार्यक्रम का उद्देश्य राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण के संरक्षण के प्रति विद्यार्थियों और समाज में जागरूकता फैलाना था। इस अवसर पर विभाग के शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने गोडावण संरक्षण की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया तथा जैव विविधता संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों का संकल्प लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष प्रो. सुब्रतो दत्ता के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने कहा कि गोडावण केवल राजस्थान की पहचान नहीं, बल्कि देश की प्राकृतिक धरोहर है। तेजी से घटती संख्या इस बात का संकेत है कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे पर्यावरण संरक्षण को केवल अकादमिक विषय न मानकर सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाएं।
प्रो. प्रवीण माथुर ने अपने संबोधन में कहा कि गोडावण संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि आवासीय क्षेत्र में कमी, विद्युत लाइनों से टकराव तथा मानवीय हस्तक्षेप गोडावण के अस्तित्व के लिए प्रमुख खतरे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर अधिक शोध एवं जनजागरूकता अभियानों की आवश्यकता पर बल दिया।

वन्यजीव जीवविज्ञानी डॉ. विवेक शर्मा ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में गोडावण की पारिस्थितिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गोडावण मरुस्थलीय जैव विविधता का महत्वपूर्ण संकेतक पक्षी है और इसकी उपस्थिति स्वस्थ घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाती है। डॉ. शर्मा ने बताया कि कभी राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले गोडावण अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को फील्ड रिसर्च और संरक्षण गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।

गौरतलब है कि ‘गोडावण दिवस’ राजस्थान में राज्य पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। गोडावण, जिसे अंग्रेज़ी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है, विश्व के अत्यंत संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों, विशेषकर जैसलमेर एवं आसपास के घासभूमि क्षेत्रों में इसका सीमित आवास शेष बचा है। संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार विद्युत तारों से टकराव, अवैध शिकार और प्राकृतिक आवास के क्षरण के कारण इसकी संख्या में लगातार गिरावट आई है।

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