एमडीएसयू में सिंधी भाषा दिवस पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन
भाषा, संस्कृति और विरासत का उत्सव
अजमेर : 10 अप्रैल 2026
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के सिंधु संस्कृति एवं सिंधु शोध पीठ के तत्वावधान में आज सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के गहन संदेशों से परिपूर्ण रहा, जिसमें शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता देखने को मिली।
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संगोष्ठी का आयोजन उस ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में किया गया, जब 10 अप्रैल 1967 को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सिंधी भाषा को सम्मिलित कर उसे संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई थी। इसी उपलक्ष में देशभर में प्रतिवर्ष 10 अप्रैल को सिंधी भाषा दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत भाषण से हुआ, जिसे डॉ. राजू शर्मा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने सिंधी भाषा के ऐतिहासिक महत्व, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि तथा वर्तमान संदर्भ में उसके संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित विद्वान प्रो. हासो दादलानी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सिंधी भाषा की उत्पत्ति, विकास यात्रा तथा उसकी साहित्यिक परंपरा को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सिंधी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत है, जो पीढ़ियों को जोड़ने का कार्य करती है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. चंद्रप्रकाश दादलानी ने अपने संबोधन में सिंधी समुदाय के संघर्ष, विशेषकर विभाजन के पश्चात भाषा एवं संस्कृति को संरक्षित रखने के अद्वितीय प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि भाषा का अध्ययन केवल ज्ञान का विस्तार नहीं करता, बल्कि यह व्यक्ति की सांस्कृतिक पहचान को भी सुदृढ़ करता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सिंधु शोध पीठ के निदेशक प्रो. सुभाष चंद्र ने की उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने सिंधी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय में भाषाई अध्ययन के क्षेत्र में नए अवसर उभर रहे हैं, जिन्हें विद्यार्थियों को अपनाना चाहिए।
संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि भाषाएं समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं। सिंधी भाषा, अपनी मधुरता, समृद्ध शब्दावली और ऐतिहासिक गहराई के कारण भारतीय भाषाई परंपरा में एक विशिष्ट स्थान रखती है।
विभाजन के बाद भी सिंधी समुदाय द्वारा अपनी भाषा और संस्कृति को जीवित बनाए रखना इस बात का प्रमाण है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि अस्तित्व और आत्मसम्मान का आधार है।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि नई पीढ़ी भी अपनी भाषाई विरासत के प्रति जागरूक हो रही है। संगोष्ठी ने न केवल ज्ञानवर्धन किया, बल्कि भाषा के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान की भावना को भी सुदृढ़ किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नेमीचंद चंद तंबोली द्वारा किया गया जिन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित एवं रोचक बनाए रखा। अंत में सिंधु शोध पीठ के सदस्य सचिव दिलीप शर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।