जीरे में झुलसा रोग प्रबन्धन
अजमेर : 14 जनवरी 2026
रबी की फसल जीरे में होने वाले झुलसा रोग से बचाव के लिए किसानों को विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए। ग्राहृय परीक्षण केन्द्र, तबीजी फार्म के कृषि अनुसंधान अधिकारी (पौध व्याधि) डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने बताया कि बीजीय मसाला फसलों में जीरा एक महत्वपूर्ण फसल हैं। जीरे का उपयोग सभी सब्जियों, सूप, आचार, सॉस आदि को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता हैं। जीरे की फसल में कई हानिकारक रोगों का प्रकोप होता हैं। इनमें से झुलसा रोग का समय पर नियंत्रण नहीं करने पर काफी हानि होती हैं। इसलिए कृषकों को सलाह दी जाती हैं कि जीरे की फसल को रोगों से बचाने हेतु विभागीय सिफारिश अनुसार फफूंद नाशियों का छिड़काव करें तथा छिड़काव करते समय हाथों में दस्ताने, मुंह पर मास्क तथा पूरे वस्त्र पहने।
उन्होंने बताया कि झुलसा रोग एक कवक जनित रोग हैं इसको सामान्य भाषा में इसको काल्या रोग के नाम से भी जाना जाता हैं। फसल में फूल आने वाली अवस्था में अगर आकाश में बादल छाये रहे तो इस रोग का प्रकोप होने की संभावना बढ जाती है। रोग के प्रकोप से पौधों की पत्तियों के सिरे झुके हुए नजर आते हैं। पौधों की पत्तियां व तनों पर भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। यह रोग पत्तियों सेे वृन्त, तने एवं बीजों पर फैल जाता हैं। इस रोग का प्रसार इतना तीव्र होता हैं कि अगर समय पर नियंत्रण ना किया जाए तो फसल को बचाना मुश्किल हो जाता हैं।
उन्होंने बताया कि इस रोग से बचाव हेतु बुवाई के 30-35 दिन बाद दो ग्राम थायोफेनेट मिथाइल प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें तथा आवश्यकतानुसार 15 दिन बाद दोहराएं अथवा रोग के लक्षण दिखाई देने पर डाईफेनोकोनाजॉल का 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें तथा दुसरा व तीसरा छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर पुनः दोहराएं अथवा बुवाई के 35 दिन बाद एक मिली लीटर प्रोपीकोनाजोल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर तीन छिड़काव करें।


